Rahat Indori Shayari

डा॰ राहत इंदौरी की शायरी


"लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के सँभलते क्यों है..

जो इतना डरते है तो घर से निकलते क्यों है"

-राहत इंदौरी


"किसने दस्तक दी ये दिल पर.. कौन है..

आप तो अंदर है बाहर कौन है"

-राहत इंदौरी

 

"राज़ जो कुछ भी हो इशारों में बता भी देना..

हाथ जब उससे मिलाना तो दबा भी देना"

-राहत इंदौरी

 

"ज़ुबान तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे..

मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे"

-राहत इंदौरी


 

"तेरे बदन की लिखावट में है उतार-चढ़ाव..

मैं तुझको कैसे पढूंगा मुझे किताब तो दे"

-राहत इंदौरी


 

"रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता है..

चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है"

-राहत इंदौरी


 

"उसकी याद आयी है साँसों ज़रा आहिस्ता चलो..

धड़कनो से भी इबाबत में खलल पड़ता है"

-राहत इंदौरी


 

"समंदरों के सफर में हवा चलाता है..

जहाज़ खुद नहीं चलते खुदा चलाता है"

-राहत इंदौरी


 

"ये लोग पाँव नहीं ज़हन से अपाहिज़ है..

उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है"

-राहत इंदौरी


 

"हम अपने बूढ़े चरागों  पे खूब इतराये..

और उसे भूल गए जो हवा चलाता है"

-राहत इंदौरी


 

"ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था..

मैं बच भी जाता तो एक रोज़ मरने वाला था..

मेरा नसीब.. मेरे हाथ कट गए..

वर्ना मैं तेरी मांग में सिन्दूर भरने वाला था "

-राहत इंदौरी


 

 

"तूफानों से आँख मिलाओ.. सैलाबों पर वार करो..

मल्लाहों का चक्कर छोड़ो.. तैर के दरिया पार करो..

फूलों की दुकाने खोलो.. खुशबु का व्यापार करों..

इश्क़ खतां है तो ये ख़ता एक बार नहीं सौ बार करों "

-राहत इंदौरी


 

"आप हिन्दू मैं मुसलमान ये ईसाई वो सिख..

यार छोड़ो ये सब सियासत है चलो इश्क़ करें"

-राहत इंदौरी 



"शाम के बाद जब तुम सहर देख लो..

कुछ फ़क़ीरों को खाना खिलाया करों"

-राहत इंदौरी

 

"उसकी कथई आँखों में है जंतर-मंतर सब..

चाक़ू-वाकु छुरिया-वुरियां खंजर-वंजर सब..

जिस दिन से तुम रूठी..मुझसे रूठे-रूठे है चादर-वादर तकिया-वकिया बिस्तर-विस्तर  सब..

मुझसे बिछड़कर वो भी कहाँ अब पहले जैसी है.. फ़ीके पड़ गए कपडे-वपड़े जेवर-वेवर सब "

-राहत इंदौरी


 

"लू भी चलती थी तो वो बाद--सबा कहते थे..

पाँव फैलाये अंधेरो को ज़िया कहते थे..

उनका अंजाम तुझे याद नहीं शायद..

और भी लोग थे जो खुद को खुदा कहते थे"

-राहत इंदौरी


 

"शाखों से टूट जाए वो पत्ते नहीं है हम..

आंधी से कोई कह दे के औकात में रहे"

-राहत इंदौरी


 

"कभी महक की तरह है हम गुलों से उड़ते है..

कभी धुए की तरह पर्वतों से उड़ते है..

ये कैंचियां हमें उड़ने से ख़ाक रोकेंगी..

के हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते है"

-राहत इंदौरी



"अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ..

मैं चाहता था की चरागों को आफ़ताब करूँ..

उस आदमी को बस एक धुन सवार रहती है..

बहुत हसीन है दुनिया इसे खराब करूँ"

-राहत इंदौरी


 

"ये ज़िन्दगी जो मुझे कर्ज़दार करती रही..

कभी अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ"

-राहत इंदौरी


 

"झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो..

सरकारी एलान हुआ है सच बोलो..

घर के अंदर झूठों की एक मंडी है..

दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो"

-राहत इंदौरी


 

"गुल्दस्ते पर यग-जेहती लिख रखा है..

गुल्दस्ते के अंदर क्या है सच बोलों"

-राहत इंदौरी


 

"गंगा मैया.. डूबने वाले अपने थे..

नाव में किसने छेद किया है सच बोलो "

-राहत इंदौरी