Munnawar Rana Shayari

“एक कम पढ़े-लिखे का कलम हो के रह गई..

ये ज़िन्दगी भी गूंगे का गम हो के रह गई"

-मुन्नवर राणा



"सेहरा में चीखते रहे कुछ भी नहीं हुआ..

मिटटी की तरह रेत भी नम हो के रह गई"

-मुन्नवर राणा


                   

"कश्कोल में छुपी थी अनादि फ़क़ीर की..

ये बेज़ुबान सिक्कों में ज़म हो के रह गई"

-मुन्नवर राणा


 

"एक वक़्त की पढ़ी कभी दो वक़्त की पढ़ी..

याद--खुदा भी याद--सनम हो के रह गई"

-मुन्नवर राणा


 

"थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए..

हम अपनी कब्र - -मुक़र्रर में जा के लेट गए..

तमाम उम्र हम एक -दूसरे से लड़ते रहे..

मगर मरे तो बराबर में जा के लेट गए"

-मुन्नवर राणा


 

"एक ज़ख़्मी परिंदे के तरह जाल में हम है..

इश्क़ अभी तक तेरे जंजाल में हम है"

-मुन्नवर राणा


 

"हँसतें हुए चेहरे ने भ्रम रखा हमारा..

वो देखने आया था की किस हाल में हम है"

-मुन्नवर राणा


 Munnawar Rana Nazm

"मैं दहशतगर्द था..

मरने पे बेटा बोल सकता है..

हुकूमत के इशारे पर तो मुर्दा बोल सकता है..

यहां पर नफरतों ने कैसे-कैसे गुल खिलाये है..

लूटी इस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है..

हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती..

अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है..

कई चेहरे अभी तक मुँह-ज़बानी याद है इसको..

कहीं तुम पूछ मत लेना ये गूंगा बोल सकता है..

अदालत में गवाही के लिए लाशें नहीं आती..

वो आंखें बुझ चुकी है फिर भी चश्मा बोल सकता है..

बहुत सी कुर्सियां इस मुल्क में लाशों पे रखी है..

ये वो सच है जिससे झूठे से झूठा बोल सकता है"

- मुन्नवर राणा



Munnawar Rana Muhajir-Nama 

मुहाजिर-नामा

"मुहाजिर है मगर हम एक दुनिया छोड़ आये है..

तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आये है..

कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती है..

की हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आये है..

भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी..

वही झूले में हम जिसको गुमकता छोड़ आये है..

ये खुदगर्ज़ी का जज़्बा आजतक हमको रुलाता है..

की हम बेटे तो ले आए भतीजा छोड़ आये है..

हमारी अहल्या तो गई माँ छूट गई आखिर..

की हम पीतल उठा लाये और सोना छोड़ आये है"

- मुन्नवर राणा