Meraj Faizabadi Shayari

मेराज फ़ैज़ाबादी शायरी 

 

"मुझे थकने नहीं देता जरुरत का पहाड़..

मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते"

-मेराज फ़ैज़ाबादी 

 

"मैं समंदर भी किसी गैर के हाथों से ना लूँ..

एक क़तरा भी समंदर है अगर तू दे दे"

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"सबके दुःख-दर्द सिमट आये मेरे सीने में..

बाट दे सबको हसीं ला मुझे आसूं दे दे"

-मेराज फ़ैज़ाबादी 

 

"ज़िन्दगी दी है तो जीने का हुनर भी देना..

पाँव बख्शें है तो तौफ़ीक़-ऐ-सफ़र भी देना"

-मेराज फ़ैज़ाबादी 

 

"गुफ्तगू तूने सिखाई है की मैं गूंगा था..

अब मैं बोलूंगा तो बातों में असर भी देना "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"किसी की मर्ज़ी को अपनी किस्मत बना चुके है..

हम अपने हाथों की सब लकीरें मिटा चुके हैं "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"उन्ही छतों से हमारे आँगन में मौत बरसी..

वहीँ छतें जिनसे हम पतंगे उड़ा चुके है "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

 

"लगा के दांव पर साँसों की आखिरी पूंजी..

मैं मुत्मईन हूँ की हारने का डर तो गया "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"चराग अपनी थकन की कोई सफाई ना दे..

वो तीरगी है की अब ख़्वाब तक दिखाई ना दे "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"बहुत सताते है रिश्ते जो टूट जाते है..

खुदा किसी को भी तौफीक--आशनाई ना दे"

-मेराज फ़ैज़ाबादी


 

"मैं सारी उम्र अंधेरों में काट सकता हूँ..

मेरे दीयों को मगर रौशनी पराई ना दे"

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"यही तेरी दुनिया का हाल है मालिक..

तो मेरी कैद भली है मुझे रिहाई ना दे"

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"मसर्रतों में भी जागे गुनाह का एहसास..

मेरे वजूद को इतनी भी पारसाई ना दे "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"मैं जीने का हुनर खोने लगा हूँ

ज़मीनो में हवस बोने लगा हूँ

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"इन अखबारों से डर लगने लगा हैं..

सो अब मैं देर तक सोने लगा हूँ "

-मेराज फ़ैज़ाबादी


"हसीं आती थी पहले आँसुओं पर..

अब बेसबब रोने लगा हूँ "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"मेरी खुद्दारियां थकने लगी है..

मैं तोहफे पा के खुश होने लगा हूँ "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"सोचा था कोई तो ये कहेगा के बैठ जाओ..

मैं उम्र भर चला हूँ इसी इंतजार में "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"सज़ा मिली है बुज़ुर्गों से बे-नियाज़ी की..

के आज अपने ही बच्चों से डर रहे है हम "

-मेराज फ़ैज़ाबादी

 

"बिखरे-बिखरे सहमे-सहमे रोज़ो-शब देखेगा कौन

लोग तेरा जुर्म देखेंगे सबब देखेगा कौन "

-मेराज फ़ैज़ाबादी 

 

"शायरी में मीरो -ग़ालिब के ज़माने अब कहाँ..

शोहरतें जब इतनी सस्ती हो तो अदब देखेगा कौन "

-मेराज फ़ैज़ाबादी