Javed Akhtar Shayari
जावेद अख्तर शायरी
"ये नया शहर तो है खूब बसाया तुमने..
क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो "
-जावेद अख्तर
"तुम ये कहते हो की मैं गैर हूँ.. फिर भी शायद..
निकल आये कोई पहचान ज़रा देख तो लो"
-जावेद अख्तर
"कभी कभी मैं ये सोचता हूँ की मुझको तेरी तलाश क्यूँ है..
अगर है सारे ही तार टूटे तो साज़ में ये इल्तियाश क्यूँ है..
कोई अगर पूछता ये हमसे.. बताते हम अगर तो क्या बताते..
भला हो सबका की ये ना पूछा की दिल पे ऐसी खराश क्यूँ है..
उठा के हाथों से तुमने छोड़ा.. चलो नादान रिश्ता तुमने तोड़ा..
अब उलटा हमसे तो ये ना पूछो की शीशा ये पाश-पाश क्यूँ है..
ना फ़िक्र कोई ना जुस्तजू है ना ख़्वाब कोई ना आरज़ू है..
ये शख्स तो कब का मर चुका है तो बेकफन फिर ये लाश क्यूँ है "
-जावेद अख्तर
"पुर-सुकून लगती है कितनी झील के पानी पे बथ..
पैरों की बेताबियाँ.. पानी के अंदर देखिये "
-जावेद अख्तर
"छोड़कर जिसको गए थे आप कोई और था..
अब मैं कोई और हूँ वापिस तो आ के देखिये "
-जावेद अख्तर
"अक्ल कहती है की दुनिया मिलती है बाज़ार में..
दिल मगर ये कहता है.. कुछ और बेहतर देखिये "
-जावेद अख्तर