Hari Om Pawar Kavita
गरीबी-भुखमरी पर कविता - हरि ओम पवार
"मेरा गीत चाँद है ना चांदनी है आज कल..
ना किसी के प्यार के ये रागिनी है आज कल....
मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये..
साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ़ कीजिये....
मैं गरीब के रुदन के आंसुओं की आग हूँ..
मैं भूख के मज़ार पर जला हुआ चिराग हूँ....
मेरा गीत आरती नहीं है राज-पाठ की..
कसमसाती आत्मा है सोये राजघाट की....
मेरा गीत झोपड़ी के दर्दों की जुबान है ..
भुखमरी का आईना है आसूं का ब्यान है....
भावना का ज्वार-भाटा जीये जा रहा हूँ मैं..
क्रोध वाले आंसुओं को पीये जा रहा हूँ मैं....
मेरा होश खो गया है लहुं के उबाल में..
कैदी हो कर रह गया हूँ मैं इसी सवाल में....
आत्महत्या की चिता पर देखकर के किसान को..
नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को....
सोचकर ये शोक शर्म से भरा हुआ हूँ मैं..
और मेरे काव्य धर्म से डरा हुआ हूँ मैं....
मैं स्वयं को आज गुनहगार पाने लगा हूँ..
इसलिए मैं भुखमरी के गीत गाने लगा हूँ....
गए रहा हूँ इसलिए की इंकलाब ला सकूँ..
झोपड़ी के अंधेरों में आफ़ताब ला सकूँ....
इसीलिए देशी या विदेशी मूल भूलकर..
जो अतीत में हुई है भूल भूलकर....
पंच तारा पद्धति का पंथ रोक टोक कर..
वैभवी विलासता को एक साथ रोक कर....
मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए..
झोपड़ी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए....
मेहरबानो भूख की व्यथा कथा सुनाऊंगा..
महज़ तालियों के लिए गीत नहीं गाऊंगा....
शायद आप सोंचतें हो ये विषय फ़िज़ूल है..
किन्तु देश का भविष्य ही मेरा उसूल है....
आप ऐसा सोंचतें है तो भी बेक़सूर है..
क्योंकि आप भुखमरी की त्रासदी से दूर है....
आपने देखी नहीं है भूखे पेट की तड़प..
कालदेवता से भूखे तन के प्राण की झड़प....
मैंने ऐसे बचपनों की दास्तान कही है..
जहां माँ की सूखी छातियों में दूध नहीं है....
यहां गरीबी की कोई सीमा रेखा ही नहीं..
लाखों बच्चें है जिन्होंने दूध देखा ही नहीं....
शर्म से भी शर्मनाक जीवन काटते है वे..
कुत्ते जिसे चाट चुके झूठन चाटते है वे....
भूखा बच्चा सो रहा है आसमान ओढ़कर..
माँ रोटी कमा रही है पत्थरों को तोड़कर....
जिनके पाँव नंगे है और तार-तार है..
जिनकी सांस-सांस साहूकारों की उधार है....
जिनके प्राण बिन दवाई मृत्यु के कगार है..
आत्महत्या कर रहें है भूख के शिकार है....
बेटियां जो शर्मों-हया होती है जहां की..
भूख ने जो तोड़ा तो वस्तु हो गयी दूकान की....
भूख आस्थाओं का स्वरूप बेच देती है..
निर्धनों की बेटियों का रूप बेच देती है....
भूख कभी -कभी ऐसे दांव -पेंच देती है..
सिर्फ दो हज़ार में माँ बेटा बेच देती है....
भूख आदमी का स्वाभिमान तोड़ देती है..
आन-बान-शान का ग़ुमान तोड़ देती है....
भूख सुदामाओं का भी मान तोड़ देती है..
महाराणा प्रताप की भी आन तोड़ देती है....
भूख तो हुजूर पूरा नूर छीन लेती है..
मजदूरन की माँग का सिन्दूर छीन लेती है....
किसी किसी मौत पर धर्म-कर्म भी रोता है..
क्योंकि क्रिया-कर्म का भी पैसा नहीं होता है....
घरवाले गरीब आंसूं-गम सहेज लेते है..
बिना दाह-संस्कार मुर्दा बेच देते है....
थूककर धिक्कारता हूँ मैं ऐसे विकास को..
जो कफ़न भी दे ना पाए गरीबों की लाश को....
भूख का निदान झूठे वायदों में नहीं है..
सिर्फ पूंजीवादियों के फायदे में नहीं है....
भूख का निदान कर्णधारों से नहीं हुआ..
गरीबी -हटाओ जैसे नारों से नहीं हुआ....
भूख का निदान प्रशासन का पहला कर्म है..
गरीबों की देखभाल सिंहासन का धर्म है....
इस धर्म की पालना में जिस किसी से चूक हों..
उनके साथ मुल्ज़िमों के जैसा ही सुलूक हो....
भूख से कोई मरे ये हत्या के समान है..
हत्याओं के लिए मृत्यु-दंड का विधान है....
कानूनी किताबों में सुधार होना चाहिए..
मौत का किसी को जिम्मेदार होना चाहिए....
भूखों के लिए नया कानून मांगता हूँ मैं..
समर्थन में जनता का जूनून मांगता हूँ मैं....
ख़ुदकुशी या मौत का जब भुखमरी आधार हो..
उस जिले का जिलाधीश सीधे जिम्मेदार हो....
वहां का एम॰एल॰ए, एम॰पी भी गुनहगार है..
क्योंकि ये रहनुमा चुना हुआ पहरेदार है....
चाहे नेता -अफसरों की लॉबी आज क्रुद्ध हो..
ह्त्या का मुकदमा इन तीनो के विरुद्ध हो "
- हरि ओम पवार
इंदिरा गाँधी की मृत्यु पर कविता- हरि ओम पवार
"मैं लिखते लिखते रोया था..
मैं भारी मन से गाता हूँ....
जो हिमशिखरों का फूल बनी..
मैं उनको फूल चढ़ाता हूँ....
मैंने उनके सिहांसन के विपरीत लिखा कविता गायी..
लेकिन उनके ना रहने पर आँखे आसूं भर-भर लायी....
रह-रह के झखझोर रहीं है यादें खुनी-आंधी की..
जैसे दोबारा से हत्या हो गयी महात्मा गांधी की....
वो पर्वत-राजा की बेटी ऊँची हो गयी हिमालय से..
जिसने भारत ऊँचा माना सब धर्मों के देवालय से....
भूगोल बदलने वाली वो इतिहास बदल कर चली गयी..
जिससे हर दुश्मन हार गया अपनों के हाथों चली गयी....
शातिर देशों की माटी ने ये औछी-मक्कारी की है..
पर घर के ही जयचंदों ने भारत से ग़द्दारी की है....
हमने मुट्ठी भी थी खोली लेकिन गुस्से को पी डाला..
हम कई समंदर रोए है हमने पी है गम की हाला....
हमने अपना गुस्सा रोका पूरे सयंम से काम लिया..
हिन्दू-सिख भाई -भाई है इस नारे को साकार किया....
लेकिन हिन्दू-सिख भाई है ये परपाटी नीलाम ना हो..
केवल दो-चार कातिलों से कोई मज़हब बदनाम ना हो....
जो धर्म किसी का क़त्ल करें वो धर्म नहीं हो सकता है..
गुरु नानक जी के बेटों के ये कर्म नहीं हो सकता है....
वे भी भारत के बेटें है सब के सब तो चौहान नहीं..
केवल मुट्ठी भर हत्यारें सरदारों की पहचान नहीं....
इसलिए क्रोध के कारण जब बदलें की ख़ूनी हवा चली..
सयमं डोला सो गयी बुद्धि जलने वाले थे गाँव-गली....
जब कुछ लोगों की आँखों में बदले की हवा सवार हुई..
तब हिन्दू जात आगे बढ़कर सिखों की पहरेदार हुई....
इंदिरा गाँधी की जान गयी हम एक रही परपाटी पर..
उनके लहुं का कर्जा है पूरे भारत की माटी पर....
इंदिरा जी नहीं रही है तो ये देश नहीं मर जाएगा..
कोई ना समझे कोई भारत के टुकड़े कर जाएगा....
अब कोई सपना ना देखे ये भूमि बाट ली जायेगी..
जो खालिस्तान पुकारेगी वो जीभ काट ली जायेगी....
जिनको भी मेरे भारत की धरती से प्यार नहीं होगा..
उनको भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं होगा....
धरती से अम्बर से कहना हर ताल समंदर से कहना..
कहना कारगिल की माटी से गुवाहाटी से चौपाटी से....
ख़ूनी परपाटी से कहना दुश्मन की माटी से कहना..
कहना लोभी मक्कारों से जासूसी करने वालों से ....
जो मेरा आँगन तोड़ेगी वो बाहं तोड़ दी जायेगी..
जो आँख उठेगी भारत पर वो आँख फोड़ दी जायेगी....
सैंतालीस का बटवारा भी कोई अँधा रोष रहा होगा..
जिनाह की भूख रही होगी गांधी का दोष रहा होगा....
जो भूल हुई हमसे पहले वो भूल नहीं होने देंगे..
हम एक इंच धरती भारत से दूर नहीं होने देंगे.... "
-हरि ओम पवार