Ashok Sahil Shayari
"तुम्हारी खिदमत-ऐ-उर्दू बहुत मशहूर है बेशक
मगर उर्दू को अपना खून हम हिन्दू भी देते है"।
-अशोक साहिल
"उर्दू के चंद लफ्ज़ है जब से ज़बान पर
तहज़ीब मेहरबान है मेरे खानदान पर"।
-अशोक साहिल
"ग़ज़ल श्रृंगार करके चूड़ियां खनकाने लगती है
तुम्ही हो जिनसे मिलकर शायरी इतराने लगती है
मुझे अल्लाह ने एक ख़ास खूबी से नवाज़ा है
जिन्हे छूता हूँ उन लफ़्ज़ों से खुश्बूं आने लगती है
किसी का दिल दुखाकर जब भी दो पैसे कमाता हूँ
मुझे खुद रोटियों से खून की बू आने लगती है
तुम्हारे जिस्म को छूकर आता है कोई झोंखा
निबोली नीम की भी शहद सा टपकाने लगती है"।
-अशोक साहिल
"क्या जाने कौन जलजला कर दे इन्हे तबाह
ऊँची इमारतों को न इतरा के देखिये..
औकात जाननी हो अगर अपनी आप को..
अफ़वाह अपनी मौत की फैला कर देखिये"।
-अशोक साहिल
"ग़मों की धूप में भी मुस्कुरा कर चलना पड़ता है
ये दुनिया है यहां चेहरा सजा कर चलना पड़ता है
तुम्हारा क़द मेरे क़द से बहुत ऊंचा सही लेकिन
चढ़ाई पर कमर सब को झुकाकर चलना पड़ता है
सियासत साजिशों के एक ऐसा खेल है जिसमे
कई चालों को खुद से भी छुपाकर चलना पड़ता है"।
-अशोक साहिल
"ऐ सितारों तुम्हे कलियों के तबस्सुम की कसम
ओस की बूँद पर सूरज की गवाही लेना
खो गयी है मेरे महबूब के चेहरे की चमक
चाँद निकले तो ज़रा उसकी तलाशी लेना"।
-अशोक साहिल
"किसी से कोई ताल्लुक न दोस्ती न लगाव
फ़िज़ूल अपनी जवानी गवाँ रहा था मैं
तेरी निग़ाह ने एक काम दे दिया वरना
बहुत दिनों से कबूतर उड़ा रहा था मैं"।
-अशोक साहिल
"नज़र नज़र में उतरना कमाल होता है
नफ़स नफ़स में बिखरना कमाल होता है
बुलंदियों पे पहुचंना कोई कमाल नहीं
बुलंदियों पर ठहरना कमाल होता है" ।
-अशोक साहिल